Monday, December 17, 2012

प्यासे मर जाना बेहतर है......



जिस तट पर पानी पीने से, अपमान प्यास का होता हो,
उस तट पर पानी पीने से, प्यासे मर जाना बेहतर है।

कांटे तो अपनी आदत के अनुसार नुकीले होते हैं,
कुछ फूल जगत में ऐसे हैं, उनसे जहरीले होते हैं,
माली यदि आंखें बंद किये, मधु के बदले विष से सींचे,
ऐसे उपवन में खिलने से, पहले झर जाना बेहतर है।
जिस तट पानी पीने से.............................

नौका को डुबो देने की जिद पर, यदि तूफां ही डट जाए, 
हर एक लहर नागिन बनकर, डसने के लिए फन फैलाए,
तो ऐसे में भीख किनारों की, धारों से मांगना ठीक नहीं,
पागल तूफानों से लड़कर, मझधार समाना बेहतर है।
उस तट पर पानी पीने से...........................

जो दिया उजाला दे ना सके, तम के चरणों का दास रहे,
अंधियारी रातों में सोये, दिन में दिनकर के पास रहे,
जो पल-पल धुंआ उगलता हो, जीवन में कालिख मलता हो,
ऐसे दीपक के जलने से, पहले बुझ जाना बेहतर।
जिस तट पर पानी पीने से.........................

Thursday, December 13, 2012

जर्नी की जद्दोजहद


...और कब तक चलेगी यह जर्नी की जद्दोजहद
आम यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए कुलियों का झुण्ड भी आ पहुंचा. कोच के अंदर घुसाने के लिए उन्होंने भी लोगों से 20 से 50 रुपये तक का तकादा शुरु कर दिया. लोगों को कोच के अंदर घुसाने का उनका तरीका भी बड़ा अनोखा था. एक कुली ने आपातकालीन खिड़की खोली और साथ के दो कुलियों ने यात्री को समान समेत कोच के अंदर फेंक दिया.

दोस्तों, आजकल थोड़ा फुरसत में हूं, मतलब काम का बोझ कुछ कम है तो थोड़ा सोशल होकर चलते-फिरते लोगों की समस्याओं पर नजरे इनायत कर लेता हूं या कहूं कि ना चाहते हुये भी लोगों के दर्द से नजरें फेर नहीं पाता. दूसरे शब्दों में ये भी कहा जा सकता है कि लोगों के दर्द को किसी सामाजिक पटल (सोशल नेटवर्किंग साइट) पर रखकर उन महानुभावों के सामने लाने का प्रयास कर रहा हूं जो समाजसेवा के बड़े-बडे़ दावे करते हैं. यानी वे राजनेता जो देश के लिए नीतियां बनाने का काम कर रहे हैं और खुद को तथाकथित समाज सेवक कहने का दम्भ भरते हैं.

रेल मतलब आम आदमी की लाइफ लाइन. आज भी देश के सैकड़ों ऐसे इलाके हैं, जहां पहुंचने के लिए समुचित सड़क मार्ग नही हैं. ज्यादा दूर की और पुरानी बात नहीं करूंगा, मैं खुद ही पिछले हफ्ते कानपुर से दिल्ली के ट्रैक पर ऐसा फंसा कि मुझे घंटों ट्रेन में बैठकर अपने गंतव्य तक पहुंचने का इंतजार करना पड़ा. वजह उस रेलवे रूट से सड़क मार्ग तक पहुंचने का कोई साधन नहीं था. सड़क वहां से करीब 5 से 10 किमी की दूरी पर थी और पैदल जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.

रेल से सफर करने वाले कुल लोगों में से आधे से अधिक लोग अनारक्षित टिकट पर यात्रा करते हैं. इसके बाद भी रेलों में अनारक्षित कोचों की संख्या दो से चार ही होती है. करीब-करीब लम्बी दूरी की हर ट्रेन में आलम यह होता है कि आरक्षित कोच में बैठने वाले लोगों की संख्या से कहीं ज्यादा लोग अनारक्षित कोच में ठुंसे होते हैं. बैठने की बात तो दूर इन कोचों में पैर रखने की भी जगह मिल जाये तो यह देश के आम आदमी का सौभाग्य होगा. 

हाल ही में ऐसी विषम परिस्थिति का एक उदाहरण मेरी आंखों के सामने से गुजरा. मैं लखनऊ से कानपुर जाने के लिए पुष्पक एक्सप्रेस में बैठा, जो कि हर रोज लखनऊ से मुम्बई के लिए निकलती है. दर्जन भर से अधिक आरक्षित श्रेणी के डिब्बों के बीच में दो अनारक्षित श्रेणी के कोच. ऐसी स्थिति में आखिर लोग करें तो क्या करें. ट्वायलेट से लेकर सीट के नीचे तक जिसको जहां जगह मिली बैठ गया और पूरा कोच ठसाठस. खैर मुझे तो कानपुर तक ही जाना था मैं भी दरवाजे पर लटक लिया. करीब डेढ़ घंटे बाद आ गया कानपुर स्टेशन. प्लेटफार्म पर ट्रेन रुकने से पहले ही अनारक्षित वर्ग के यात्रियों ने दौड़ लगानी शुरु कर दी. प्लेटफार्म पर कदम रखने से पहले ही करीब 50 से 60 लोगों की भीड़ जरनल कोच के गेट पर जमा हो गई. जगह न होने के बाद भी कोच में घुसने के लिए लोगों की मारामारी शुरु हो गई.

अब यहां से शुरु होता है इस जद्दोजहद का दूसरा भाग. आम यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए कुलियों का झुण्ड भी आ पहुंचा. कोच के अंदर घुसाने के लिए उन्होंने भी लोगों से 20 से 50 रुपये तक का तकादा शुरु कर दिया. लोगों को कोच के अंदर घुसाने का उनका तरीका भी बड़ा अनोखा था. एक कुली ने आपातकालीन खिड़की खोली और साथ के दो कुलियों ने यात्री को समान समेत कोच के अंदर फेंक दिया. टेªन के प्लेटफार्म छोड़ने तक लोगों की ये जद्दोजहद चलती रही, जो यात्रा करने के लिए अपनी जान लड़ाने को तैयार से वो तो कोच में चढ़ गये बाकी को अपनी सफर शुरु करने के पहले ही खत्म करना पड़ा.

आम यात्रियों के इस जद्दोजहद भरे सफर के बाद सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक लोगों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ेगा? आजादी के करीब 65 साल बाद भी आम आदमी को आराम से सफर करने की सहूलियत नहीं मिल पा रही है. रेलों की संख्या तो हजारों में है, लेकिन उनके अनारक्षित कोच आज तक नहीं बढ़ाये गये. एक्स्ट्रा कोच भी लगाये जाते हैं तो एसी और स्लीपर के. आखिर हर साल बजट में देश के उन 60 फीसदी गरीबों का ख्याल सरकार को क्यों नहीं आता, जिनके मतों के चलते वह सत्ता का सुख ले रहे हैं. वोटों के चक्कर में पिछले कई सालों से रेल यात्रा का किराया नहीं बढ़ाया गया, लेकिन दूसरी तरफ लोगों की आम जरुरतों की चीजें दिनोंदिन मंहगी होती जा रही हैं. अरे, किराया बढ़ाना है तो बढ़ाइये, लेकिन कम से कम लोगों को आरामदायक सफर तो उपलब्ध कराइये.