Thursday, August 26, 2010

गौरी

गौरी


अधखुले ये होंठ तेरे और कमसिन सी जवानी
छरहरा ये वादन तेरा और ऑंखें भी रूमानी
बिखरी-बिखरी चेहरे पे जुल्फें और गौर वर्ण तेरा
किसको-किसको मजबूर करोगी करने को तुम बेमानी

मेरे और तुम्हारे होंठ

मेरे और तुम्हारे होंठ.....

कुछ मीठे कुछ खारे होंठ,
से भरे तुम्हारे होंठ,
सोलह मधु मौसम बीते,
फिर भी अभी कंवारे होंठ,
हल्का सा भी हिले अगर,
लगता मुझे पुकारें होंठ,
काले मेघों में भी लगते,
सतरंगी से प्यारे होंठ,
जाने कब मिल पाएंगे,
मेरे और तुम्हारे होंठ...