Saturday, July 31, 2010

वो दौर कितना हसीन था......

वो दौर कितना हसीन था जब होती थी मुलाकाते
दिन छोटे लगते थे और लम्बी लगती थी रातें
बहाने बनाकर साथ-साथ निकलते थे हम घर से
और हर रात चुपके-चुपके करते थे फ़ोन पर बातें

बिन बात के कभी-कभी हो जाती थी नाराज तुम
अपनी बचकानी हरकतों से भरती लवों पे मुस्कराहट तुम
भागना तितलियों के पीछे और जुगनुओं को पकड़ना
फिर भी जाने इतनी क्यों प्यारी लगती थीं 'राज' को तुम

रखा तुमने जब कदम जवानी की दहलीज पे
हो गए पर्दा नशी तुम और मिलते थे बस ईद पे
सुना था मैंने किसी से तुम रोये थे मेरे लिए
जब तय हुआ निकाह तुम्हारा आने वाली बकरीद पे

सोचा था मैंने कभी इक दौर ये भी आयेगा
मुझसे दूर हो कर के तू किसी और का हो जायेगा
आयेगे हिस्से में मेरे गर्दिश भरे वो रात-दिन
कि नाव निकलेगी सफ़र पे और साहिल खड़ा पछतायेगा

1 comment:

  1. Bahut Khoob Rajkamal ji.. Super Though ang gr8 writing man.. I am Really imressed... The Wor You've written in this poetry, Shows your true feeling...


    Well Doen... Keep It Up!!!

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