Sunday, September 2, 2018

जीजा का जलवा

होली की ठिठोली में अगर जीजा भी हों हमजोली तो फिर बात ही क्या है। रंग खेलने का मजा ही दोगुना हो जाता है। लेकिन यहां बात थोड़ी हटकर है। हमारे जीजा हमजोली नहीं थे। हम तो उनके आगे छोटे-छोटे बच्चे थे। लेकिन जीजाजी आ जाएं तो उनका क्रेज हमारे सिर चढ़कर बोलता था। हम सामने तो नहीं जाते थे, लेकिन मेहमानखाने के आसपास खड़े होकर कनखियों से उनको ही निहारा करते थे।
खैर किस्सा तो होली का चल रहा था। फागुन का महीना था और होली आने में कुछ ही दिन बचे थे। मैं कक्षा चार या पांच की छात्रा थी उस समय। मुझे चिट्ठी पढ़नी आती थी। घर में कोई भी खत आता था तो मैं ही अम्मा को पढ़कर सुनाती थी।
जीजाजी होली पर अक्सर आते थे। लेकिन इस बार उनके आने की कोई सूचना नहीं थी। ठीक होली के एक दिन पहले उनका खत आया। उन्होंने खासतौर से अपनी छोटी-छोटी सालियों के लिए लिखा था। खत के साथ में उन्होंने रंग भी भिजवाया था। खत को लेकर मैं इतना खुश थी कि मैंने उसे अपनी सहेलियों के साथ अपनी चचेरी बहनों को भी दिखाया।
जीजा ने खत में सभी का कुशल मंगल पूछने के साथ हम सभी को प्यार भेजा था। होली पर ना आने का खेद जजाते हुए उन्होंने लिखा कि तुम सभी के लिए रंग भिजवाया है। इसे होली पर अपने हाथों से गालों पर लगा लेना। तुमको कसम है।
होली वाले दिन सुबह-सुबह ही मैं जीजा की ओर से भेजे गए रंग के पैकेट को लेकर अपनी चचेरी बहनों के पास पहुंच गई; हम सभी ने रो-रोकर वह रंग अपने गालों पर लगाया। अम्मा ने जब यह सीन देखा तो वह हैरत में पड़ गई। वो हमारे पास आईं और पूछा, ये क्या तमाशा लगा रखा है। तुम सब रो-रोकर यह रंग क्यों अपने गालों पर लगा रही हो। तब मैंने अम्मा को किस्सा बताया।
जीजा का खत आया था। उन्होंने उसके साथ में रंग भेजकर लिखा था कि इसे गालों पर अपने हाथों से लगा लेना। तुमको कसम है। अम्मा फिर तुम्हीं ने तो बताया था कि कोई कसम दे तो उसे मानना चाहिए। कसम तोड़ने से वो आदमी मर जाता है। हम तो इसीलिए रोकर रंग लगा रहे हैं, कहीं जीजा मर ना जाएं। मेरा इतना कहना था कि अम्मा खूब जोर से हंस पड़ीं।


Friday, August 24, 2018

पत्तेचाट

अखबार की दुनिया में दो प्रकार के लोग पाए जाते हैं, एक तो पत्तेचाट और दूसरे गैरपत्तेचाट। गैरपत्तेचात हैं तो कोई बात नहीं। पत्तेचाट हैं तो उसमें दो बातें हो सकती हैं। या तो वो संपादक बन जायेगा या फिर जिस पोस्ट पे था वहीं बना रहेगा। संपादक बना तो कोई बात नहीं। नहीं बना तो फिर दो बातें। या तो वो नौकरी छोड़ देगा या करता रहेगा। छोड़ दी तो बहुतों का भला। नहीं छोड़ी तो उसमें भी दो बातें। या तो वो दूसरों का काम लगायेगा या नए संपादक की pattechaati में आ जायेगा। pattechaati की तो रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन पा जायेगा और दूसरों का काम लगाया तो अपने ही समाज से कट जायेगा।

फाइनली साला मर के चला जायेगा और कोई दरवाजे पर भी नहीं जायेगा। बस लोग यही कहेंगे अच्छा huwa साले से पिंड छूटा।

Moral***** जिंदगी में ऐसा काम करो कि किसी का दिल न दुखे। बाकी सब ठीक है, बस नशा थोड़ा अच्छा है।

Sunday, August 19, 2018

मजबूरियाँ


वो वहां पर पीर में है, हम यहां जंजीर में हैं।
या खुदा इसके सिवा, और क्या तकदीर में है।
कर दे बारिश रहमतों की, सावन के महीने में।
क्योंकि जान तेरे बंदे की, रहती उसकी हीर में है।
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चंद सिक्कों के लिए, मजबूर कितने हो गए।
तन्हा पड़े परदेश में और अपनों से दूर हो गए।
कमा के मुट्ठी भर हमने अंजुरी भर गंवा दिया।
निकले थे पहचान बनाने, मजदूर बन के रह गए।
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क्या कहूं, किसने कहूं और सुनेगा कौन।
दिनभर चारदीवार में पड़ा रहता हूं मौन।

चुना था सुख-चैन पर हिस्से में हैं तन्हाइयां।
लूटकर ले गया कोई, जिंदगी की रानाइयां।
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दो रोटी और दो ही लंगोटी, में चल सकता है काम।
जीवन में लाया बाजारवाद, नित रोज नए संग्राम॥

आज फ्रिज, कल कूलर परसों एसी की आस।
भौतिकता की दौड़ में कभी न बुझेगी प्यास॥

दौलत से मिल जाएंगे, तुम्हें दर्जनों यार।
नहीं मिलेगा बस, अपने मां-बाप सा प्यार॥

भूख से ज्यादा खाओगे तो हो जाएगा पेट खराब।
छोड़ दो उनके खातिर भी, बिगड़ा जिनका हिसाब॥

राज कमल अवस्थी

Saturday, August 18, 2018

टुकडों टुकडों में दर्द


मीलों दूर से लौट आती थीं, उड़ी हुई नींदें मेरी।
उसकी नाजुक नर्म उंगलियां, जब बालों में बलखाती थीं।।

चांद आएगा निकट तो बेचैनी फिर लाजमी है।
न मानो तो समंदर से पूछ लो, ये रवायत आज भी है।

एक कली आती है रोज फूल चुनने गुलाब के।
कौन इसको ये बताये नही कम वो किसी शराब से।
मैं नशे में हो जाता हूं रोज उसको देखकर।
या खुदा बचा ले कोई गुस्ताखी न हो इस राज से।।

चेहरे पर नहीं दिखाई देंगी तुम्हें दर्द की लकीरें।
सारा दर्द मैंने अपने दिल में छुपा रखा है।
मिलेगी नहीं तुमको मेरे चेहरे पर भी शिकन।
क्योंकि हर दर्द को अपने कफ़न पहना रखा है।
राज