वो वहां पर पीर में है, हम यहां जंजीर में हैं।
या खुदा इसके सिवा, और क्या तकदीर में है।
कर दे बारिश रहमतों की, सावन के महीने में।
क्योंकि जान तेरे बंदे की, रहती उसकी हीर में है।
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चंद सिक्कों के लिए, मजबूर कितने हो गए।
तन्हा पड़े परदेश में और अपनों से दूर हो गए।
कमा के मुट्ठी भर हमने अंजुरी भर गंवा दिया।
निकले थे पहचान बनाने, मजदूर बन के रह गए।
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क्या कहूं, किसने कहूं और सुनेगा कौन।
दिनभर चारदीवार में पड़ा रहता हूं मौन।
चुना था सुख-चैन पर हिस्से में हैं तन्हाइयां।
लूटकर ले गया कोई, जिंदगी की रानाइयां।
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दो रोटी और दो ही लंगोटी, में चल सकता है काम।
जीवन में लाया बाजारवाद, नित रोज नए संग्राम॥
आज फ्रिज, कल कूलर परसों एसी की आस।
भौतिकता की दौड़ में कभी न बुझेगी प्यास॥
दौलत से मिल जाएंगे, तुम्हें दर्जनों यार।
नहीं मिलेगा बस, अपने मां-बाप सा प्यार॥
भूख से ज्यादा खाओगे तो हो जाएगा पेट खराब।
छोड़ दो उनके खातिर भी, बिगड़ा जिनका हिसाब॥
राज कमल अवस्थी
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